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बद्री दत्त पाण्डेय - प्रेरक प्रसंग

चलाओ गोली 'बद्री दत्त पाण्डेय'

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बद्री दत्त पाण्डेय
उत्तरायणी का मेला था | बागेश्वर में सरयू के किनारे एक विशाल मैदान में हजारों लोग जमा थे | यह लोग कुली बेगार, कुली उतार और बर्दायश जैसी कुप्रथाओं का विरोध करने के लिए एकत्र हुए थे | यह प्रथाएं अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए चलाई थी | अंग्रेज अफसर जब भी पहाड़ी गाँवों में आते, अपना सामान ढोने के लिए गांव वालों को पकड़ते और बिना कुछ दिए उनसे तरह-तरह के काम लेते | गांव वालों को अपने जरूरी काम छोड़कर अंग्रेजों की सेवा में लग जाना पड़ता था |

मेले के दिन हो रही इस सभा की खबर अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर डायबिल के पास पहुंची | डायबिल अपने कुछ सैनिकों को लेकर सभा स्थल पर पहुंचा | उसने मंच पर भाषण दे रहे व्यक्ति को तुरंत वहां से हट जाने को कहा | उसने आदेश दिया,  " तुरंत सभा भंग कर दो और यहां से हट जाओ |" मंच से भाषण दे रहे आदमी ने डायबिल का आदेश मानने से इनकार कर दिया | कमिश्नर आगबबूला हो गया | वह चिल्लाया,  " अगर सभा भंग नहीं हुई तो सब को गोलियों से भून दूंगा|"


मंच से भाषण दे रहा आदमी डरा नहीं | वह कड़कती आवाज में बोला, " चलाओ गोली | कितनी गोलियां हैं तुम्हारे पास ?  मगर हम लोग हटेंगे नहीं | इस सभा में चालीस हजार लोग हैं | यह सब लाशों के ढेर हो जाएंगे, लेकिन एक भी आदमी पीछे नहीं हटेगा |

इस चेतावनी से डिप्टी कमिश्नर डायबिल सकपका गया | सभा पर बंदूक उठाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई | वह सिर झुकाकर लौट गया |

अपनी निर्भीकता से अंग्रेज अधिकारी को ललकारने वाला वह व्यक्ति था - ' कुमाऊँ-केसरी बद्रीदत्त पाण्डे' |


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